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गुरुजी का वेतन: एक राष्ट्रीय रहस्य (एक लंबा व्यंग्य, जो हर शिक्षक की मौन चीख है)

गुरुजी का वेतन: एक राष्ट्रीय रहस्य

(एक लंबा व्यंग्य, जो हर शिक्षक की मौन चीख है)

लेखक: संदीप नामदेव 'रसिक'



सुना है कि इस देश में भगवान हर जगह नहीं पहुँच सकते थे, इसलिए उन्होंने गुरु बनाए। फिर समय बदला। भगवान मंदिरों में रह गए और गुरु निजी विद्यालयों में।

भगवान के मंदिर में चढ़ावा बढ़ता गया, गुरु के विद्यालय में फीस बढ़ती गई, लेकिन गुरु का वेतन... वह शायद किसी संग्रहालय की वस्तु बन गया, जिसे वर्षों से किसी ने छुआ तक नहीं।

मुझे कभी-कभी लगता है कि भारत सरकार को "राष्ट्रीय रहस्यों" की सूची में एक और रहस्य जोड़ देना चाहिए—"निजी विद्यालयों के शिक्षक का वास्तविक वेतन।"

यह रहस्य परमाणु कोड से भी अधिक सुरक्षित रखा जाता है। विद्यालय की वेबसाइट पर सब कुछ मिलेगा—विश्वस्तरीय शिक्षा, स्मार्ट क्लास, रोबोटिक्स लैब, ए.आई. आधारित लर्निंग, अंतरराष्ट्रीय गतिविधियाँ, अंग्रेज़ी माध्यम, संस्कारयुक्त शिक्षा और भविष्य निर्माण की गारंटी। बस एक जानकारी नहीं मिलेगी—जिस शिक्षक के भरोसे यह सब चल रहा है, उसे महीने के अंत में कितना मिलता है?

हमारे यहाँ शिक्षक का सम्मान बहुत होता है—इतना कि उसका वेतन पूछना भी असभ्यता माना जाता है।

शिक्षक दिवस पर मंच से घोषणा होती है—"शिक्षक राष्ट्र निर्माता है।" यह सुनकर शिक्षक भी मुस्कुरा देता है। उसे मालूम है कि यह वाक्य हर साल मुफ्त में मिलता है। महँगाई बढ़ती है, लेकिन इस वाक्य की आपूर्ति कभी कम नहीं होती।

आज शिक्षक से अपेक्षा है कि वह बच्चों को नैतिकता सिखाए, डिजिटल बने, तकनीक सीखे, अंग्रेज़ी धाराप्रवाह बोले, परिणाम सौ प्रतिशत दे, अभिभावकों को संतुष्ट रखे, विद्यालय का प्रचार करे, प्रवेश बढ़ाए, सांस्कृतिक कार्यक्रम कराए, निरीक्षण संभाले और हर समय मुस्कुराता रहे।

बस एक अपेक्षा किसी की नहीं है—कि वह सम्मानजनक जीवन भी जी सके।

शिक्षक से कहा जाता है—"यह शिक्षा है, व्यापार नहीं।" यह वाक्य सुनते ही वह चुप हो जाता है। उसे याद आ जाता है कि शिक्षा व्यापार नहीं हो सकती, लेकिन उसका वेतन व्यापारिक गणित का सबसे आसान खर्च ज़रूर बन जाता है।

मुझे डर है कि आने वाले समय में नौकरी के विज्ञापन कुछ ऐसे होंगे—

«आवश्यकता है राष्ट्र निर्माता की।
योग्यता: परास्नातक, बी.एड., उत्कृष्ट व्यक्तित्व, धाराप्रवाह अंग्रेज़ी, कम्प्यूटर ज्ञान, संगीत, खेल, नृत्य, योग, सोशल मीडिया मार्केटिंग तथा प्रवेश अभियान का अनुभव।
वेतन: इतना कि राष्ट्र तो बन जाए, पर शिक्षक का घर न बन पाए।»

हमने शिक्षा को मंदिर कहा, शिक्षक को पुजारी कहा और फिर पुजारी को इतना अल्प वेतन दिया कि उसे पूजा के बाद उधार की दुकान पर जाना पड़े।

याद रखिए—जिस दिन शिक्षक अपनी प्रतिभा से अधिक अपनी मजबूरी के कारण नौकरी करेगा, उस दिन शिक्षा केवल पाठ्यक्रम रह जाएगी, प्रेरणा नहीं।

यह व्यंग्य किसी विद्यालय, किसी प्रबंधन या किसी व्यक्ति के विरुद्ध नहीं है। यह उस सोच के विरुद्ध है जो शिक्षा को निवेश नहीं, खर्च समझती है; जो शिक्षक को मानव नहीं, संसाधन मानती है; और जो राष्ट्र निर्माण के सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ से कहती है—"समर्पण रखिए, वेतन बाद में देखेंगे।"

शिक्षा का भविष्य भवनों से नहीं, शिक्षकों से बनता है। यदि भवन चमक रहे हों और शिक्षक का आत्मसम्मान धूमिल हो रहा हो, तो समझ लीजिए कि विकास का आईना धुँधला है।

अब समय आ गया है कि शिक्षक को श्रद्धांजलि नहीं, श्रद्धा मिले; तालियाँ नहीं, न्याय मिले; और सबसे बढ़कर—सम्मानजनक वेतन मिले।

क्योंकि भूखा शिक्षक राष्ट्र नहीं बनाता, वह केवल अपनी परिस्थितियों से लड़ता है। और जो व्यक्ति हर दिन अपनी ही लड़ाई लड़ रहा हो, उससे पूरे देश का भविष्य जीतने की अपेक्षा करना अन्याय है।

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